उत्तराखंड में चाय उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ ही इससे ज्यादा से ज्यादा रोजगार के अवसर सृजित करने के उद्देश्य से सरकार अब चाय नीति लाने जा रही है। इसमें चाय बागानों में पर्यटन गतिविधि को प्रमुखता से शामिल किया जा रहा है।
साथ ही पुराने बागानों को संचालन के लिए संबंधित इच्छुक कास्तकारों को देने, तीन चाय फैक्ट्रियों को पीपीपी मोड पर देने, चाय बागानों के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी को कदम उठाने जैसे बिंदुओं पर जोर दिया जा रहा है। नीति का ड्राफ्ट तैयार कर जल्द ही शासन को भेजा जाएगा। प्रदेश के आठ पर्वतीय जिलों के 29 विकासखंडों में उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड के अंतर्गत वर्तमान में चाय की खेती के लिए 1473 हेक्टेयर क्षेत्र चिह्नित है। इसमें से 1371 हेक्टेयर में चाय की खेती हो रही है। प्रतिवर्ष चाय का उत्पादन औसतन एक लाख किलोग्राम है। पर्वतीय क्षेत्रों में चाय उत्पादन की संभावनाओं को देखते हुए सरकार इसे प्रोत्साहित करने पर जोर दे रही है। इसी क्रम में पूर्व में प्रदेश की चाय नीति का ड्राफ्ट तैयार कर इसे शासन को भेजा गया था। तब शासन ने इसे उद्यान विभाग को यह कहकर लौटा दिया था कि इसमें चाय बागानों में पर्यटन गतिविधि का विषय समाहित नहीं है। अब उद्यान विभाग के अंतर्गत गठित उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड के अधिकारी नए सिरे से चाय नीति का ड्राफ्ट तैयार करने में जुटे हैं। सूत्रों के अनुसार टी टूरिज्म के तहत नीति में चाय बागानों में कैफेटेरिया, ट्रेल, चाय उत्पादन इकाई जैसी व्यवस्था के साथ ही इनसे लगे क्षेत्रों में होम स्टे पर विशेष जोर दिया जाएगा। इसके अलावा पुराने चाय बागानों का संचालन 15 साल के लिए कास्तकारों को देने, घोड़ाखाल, चंपावत व कौसानी की चाय फैक्ट्रियों को पीपीपी मोड में देने, चाय उत्पादन में मूल्य संवर्द्धन, ब्रांडिंग जैसे बिंदुओं को भी शामिल किया जा रहा है।
नीति, में टिहरी, उत्तरकाशी जिलों में चाय की खेती की संभावनाएं तलाशने और जिन आठ जिलों में वर्तमान में खेती हो रही है, वहां इसके क्षेत्रफल में वृद्धि पर जोर दिया जाएगा।
इस संबंध में संपर्क करने पर उद्यान सचिव एसएन पांडेय ने बताया कि राज्य की चाय नीति तैयार की जा रही है। विभाग से नीति का ड्राफ्ट मिलने के बाद इसे अंतिम रूप दिया जाएगा।
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