तीन हत्याओं ने फिर खड़े किए सवाल, लाख कोशिशों के बावजूद अपराधियों के सॉफ्ट टारगेट क्यों बन रहे बुजुर्ग?

कभी रिटायरमेंट सिटी के लिए जाना जाता था देहरादून, आज यहां सेफ नहीं हैं बुजुर्ग! जानिए क्या हैं इसके पीछे की वजह? रिपोर्ट- हिमांशु चौहान

देहरादून: जिसे रिटायरमेंट सिटी के तौर पर जाना जाता है. जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग नौकरी से रिटायर होने के बाद शांत और सुकून भरी जिंदगी जीने के लिए देहरादून का रुख करते हैं. खुशनुमा मौसम, शांत माहौल और बेहतर सुविधाओं की वजह से बड़ी संख्या में बुजुर्ग यहां अपना आशियाना बनाते हैं, लेकिन अब इसी रिटायरमेंट सिटी में रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी जी रहे बुजुर्गों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.

रायपुर के विष्णु लोक कॉलोनी में बुजुर्ग दंपति समेत तीन लोगों की हत्या ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि आखिर अकेले या बुजुर्ग दंपतियों के रूप में रह रहे लोग अपनी सुरक्षा के लिए किस पर भरोसा करें? पुलिस की ओर से सुरक्षा के तमाम दावे और वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष सेल होने के बावजूद अगर अपराधी घर में घुसकर बुजुर्गों को निशाना बना रहे हैं, तो कहीं न कहीं मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

तीन हत्याओं ने फिर जगाई चिंता, बुजुर्ग क्यों बन रहे अपराधियों के आसान निशाना: बीती 6 अक्टूबर को रायपुर में बुजुर्ग दंपति समेत तीन लोगों की हत्या ने पूरे शहर को झकझोर दिया. वारदात का आरोपी प्लंबर था और पुलिस ने कुछ ही घंटों में उसे गिरफ्तार भी कर लिया, लेकिन इस घटना ने अपराध की एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसमें बुजुर्गों की कमजोरी अपराधियों के लिए सबसे बड़ा फायदा बनती दिखाई देती है.

आरोपी ने पहले बुजुर्ग दंपति पर हमला किया और उनकी चीख सुनकर मदद के लिए पहुंची घरेलू सहायिका शीला को भी नहीं बख्शा. शीला अपने छोटे-छोटे बच्चों का हवाला देकर जान की भीख मांगती रही, लेकिन आरोपी का दिल नहीं पसीजा. आरोपी ने पेचकस के कूच-कूच कर हत्या कर दी.

सवाल ये है कि अगर घर में रहने वाले बुजुर्ग किसी बाहरी व्यक्ति पर भरोसा करते हैं, तो क्या वही भरोसा उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन सकता है. अगर बुजुर्ग किसी अनजान व्यक्ति पर भरोसा न करें, तो रोजमर्रा की जरूरतें पूरी कैसे होंगी. क्योंकि, ज्यादातर बुजुर्ग अकेले रहते हैं.

रिटायरमेंट के बाद सुकून चाहिए था, लेकिन सबसे बड़ा सवाल बनी सुरक्षा: देहरादून को रिटायरमेंट के बाद बसने के लिए पसंद किए जाने की एक बड़ी वजह यहां का शांत वातावरण है. यही वजह है कि कई वरिष्ठ नागरिक यहां अपने जीवन की दूसरी पारी शुरू करते हैं. कई परिवारों में बच्चे नौकरी या कारोबार के चलते दूसरे शहरों या देशों में रहते हैं.

ऐसे में माता-पिता देहरादून में अकेले या सिर्फ पति-पत्नी के साथ जीवन बिताते हैं. ऐसे में घर की मरम्मत, प्लंबिंग, बिजली, सफाई, घरेलू काम और दूसरी जरूरतों के लिए उन्हें बाहरी लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है. यही निर्भरता कई बार सुरक्षा का जोखिम भी बढ़ा देती है.

रायपुर की घटना ने इस पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है कि क्या अकेले रहने वाले बुजुर्गों के घर आने-जाने वाले लोगों की पर्याप्त जांच होती है? क्या पुलिस के पास उनके घरेलू सहायकों और सर्विस का अपडेटेड रिकॉर्ड है और क्या किसी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी समय रहते पुलिस तक पहुंचती है?

पुलिस रिकॉर्ड में 453 अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिक, फिर सुरक्षा में कहां रह गई कमी: पुलिस के मुताबिक, देहरादून जिले में कम से कम 453 ऐसे वरिष्ठ नागरिक दर्ज हैं, जो अकेले जीवन गुजार रहे हैं. इनमें कई बुजुर्गों के बच्चे दूसरे शहरों या राज्यों में रहते हैं. ऐसे वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए पुलिस मुख्यालय स्तर पर सीनियर सिटीजन सेल मौजूद है.

इसी साल एसएसपी की ओर से थाना प्रभारियों को निर्देश दिए गए थे कि वे अपने क्षेत्र में अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों के घर जाकर उनसे संपर्क करें. उनकी कुशलक्षेम लें और उन्हें पुलिस एवं कंट्रोल रूम के नंबर उपलब्ध कराएं.

बीट स्तर पर भी बुजुर्गों से नियमित संपर्क की व्यवस्था रही है, लेकिन रायपुर की घटना के बाद सवाल यह है कि इन तमाम व्यवस्थाओं का असर जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है? अगर बुजुर्गों का रिकॉर्ड पुलिस के पास मौजूद है, तो क्या उनकी सुरक्षा व्यवस्था भी उसी गंभीरता से अपडेट की जा रही है.

सिर्फ नाम और मोबाइल नंबर से नहीं बचेगी बुजुर्गों की जिंदगी: कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना कहते हैं कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा का मतलब सिर्फ थाने के रजिस्टर में उनका नाम पता और मोबाइल नंबर दर्ज करना नहीं हो सकता. जरूरत इससे आगे जाने की है. पुलिस को ये भी पता होना चाहिए कि अकेले रहने वाले बुजुर्गों के घर नियमित रूप से कौन-कौन लोग आते हैं?

उनके घरेलू सहायकों की पहचान क्या है? प्लंबर या इलेक्ट्रीशियन जैसे सर्विस प्रोवाइडर कौन हैं और बुजुर्गों की रोजमर्रा की जरूरतों में उनकी भूमिका कितनी है? खासकर उन बुजुर्गों के मामले में जिनके बच्चे दूर रहते हैं?पुलिस और स्थानीय समुदाय के बीच एक ऐसा सुरक्षा नेटवर्क तैयार करने की जरूरत है. जिसमें किसी भी असामान्य गतिविधि की जानकारी तुरंत साझा हो सके.

देहरादून में घटनाओं की फेहरिस्त लंबी: रायपुर की तीन हत्याओं से पहले भी देहरादून में बुजुर्गों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं. अब एक नजर बुजुर्गों के साथ हुए अपराधों पर दौड़ाते हैं. जो कुछ इस प्रकार से हैं.

सितंबर 2026 में डालनवाला में बुजुर्ग महिला की हत्या हुई.

अप्रैल 2026 में रिटायर्ड मुकेश जोशी को टहलते समय गोली लगी और उनकी मौत हो गई.

मार्च 2025 में 70 वर्षीय पूर्व शिक्षक का अपहरण कर हत्या कर दी गई.

अप्रैल 2023 में प्रेमनगर में भी बुजुर्ग महिला की हत्या हुई थी.

इस तरह से देखा जाए तो घटनाएं अलग-अलग हैं. अपराध के तरीके भी अलग हैं, लेकिन हर घटना के बाद एक सवाल एक जैसा ही खड़ा होता है कि क्या देहरादून में बुजुर्ग सही में सुरक्षित हैं?

अपराधियों के लिए सॉफ्ट टारगेट क्यों बन रहे बुजुर्ग? बुजुर्गों को अपराधी अक्सर आसान निशाना क्यों समझते हैं, इसकी कई वजहें हो सकती हैं. शारीरिक रूप से कमजोर होना. घर में अकेले रहना. बच्चों का दूर होना. घरेलू काम के लिए बाहरी लोगों पर निर्भरता और कई मामलों में अपनी सुरक्षा को लेकर ज्यादा सतर्क न होना अपराधियों को मौका दे सकता है.

कई बुजुर्गों की दिनचर्या भी बेहद नियमित होती है. जिससे उनके बारे में जानकारी जुटाना आसान हो सकता है. ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था को भी उसी हिसाब से बदलना होगा. केवल घटना होने के बाद आरोपी को गिरफ्तार करना पर्याप्त नहीं है. चुनौती ये है कि अपराधी को बुजुर्ग तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया जाए.

इस घटना में एंबुलेंस की देरी ने भी बढ़ाए सवाल: रायपुर की घटना के बाद स्थानीय लोगों ने एंबुलेंस व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए. स्थानीय लोगों का कहना है कि हमले के बाद तीनों घायल काफी देर तक मौके पर पड़े रहे. आसपास के लोगों ने पुलिस के साथ 108 एंबुलेंस को भी सूचना दी, लेकिन उनके मुताबिक एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंच सकी.

इसके बाद स्थानीय लोग अपने निजी वाहनों से घायलों को अस्पताल लेकर गए सवाल सिर्फ अपराध रोकने का नहीं है, बल्कि अपराध के बाद जान बचाने की व्यवस्था का भी है. गंभीर रूप से घायल किसी व्यक्ति के लिए शुरुआती कुछ मिनट बेहद अहम होते हैं. ऐसे में पुलिस रिस्पॉन्स के साथ-साथ एंबुलेंस रिस्पॉन्स टाइम की भी समीक्षा जरूरी है.

भरोसा किस पर करें बुजुर्ग, पुलिस-पड़ोसी या अपने ही सिस्टम पर: रिटायरमेंट के बाद देहरादून को अपना घर बनाने वाले बुजुर्गों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल शायद यही है भरोसा किस पर करें? घर में काम करने वाले व्यक्ति पर भरोसा करें तो सुरक्षा का डर. अनजान व्यक्ति को घर में आने न दें. तो रोजमर्रा की जरूरतें कैसे पूरी हों?

अब अकेले रहें तो अपराध का खतरा और बच्चों के पास जाएं तो अपनी बनाई जिंदगी छोड़ने का सवाल. ऐसे में पुलिस, स्थानीय प्रशासन, आरडब्ल्यूए, पड़ोसियों और समाज को मिलकर बुजुर्गों के लिए एक मजबूत सुरक्षा तंत्र तैयार करना होगा.

कैसे रुकेगा बुजुर्गों के खिलाफ अपराध? देहरादून निवासी जगमोहन रमोला कहते हैं कि रायपुर की घटना के बाद अब जरूरत सिर्फ पुलिस की कार्रवाई की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की समीक्षा की है. अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों का नियमित फिजिकल वेरिफिकेशन, बीट पुलिस की सक्रिय निगरानी, घरेलू सहायकों और नियमित रूप से घर आने वाले सर्विस प्रोवाइडर्स की पहचान.

पड़ोस आधारित सुरक्षा नेटवर्क, इमरजेंसी नंबरों की जानकारी और त्वरित पुलिस-एंबुलेंस रिस्पॉन्स को एक साथ मजबूत करना होगा. पुलिस को ये भी देखना होगा कि जिन बुजुर्गों के बच्चे दूर रहते हैं. उनके लिए स्थानीय स्तर पर तत्काल संपर्क का भरोसेमंद सिस्टम कैसे बनाया जाए. क्योंकि, रिटायरमेंट सिटी की पहचान तभी सार्थक होगी, जब यहां रिटायरमेंट के बाद जिंदगी जीने वाले बुजुर्ग खुद को सुरक्षित भी महसूस करें.

इन सवालों का जवाब कब मिलेगा?

  • देहरादून रिटायरमेंट सिटी है, लेकिन क्या यहां बुजुर्गों की जिंदगी सुरक्षित है?
  • तीन हत्याओं के बाद फिर सवाल खड़ा है. लाख कोशिशों के बावजूद बुजुर्ग अपराधियों के सॉफ्ट टारगेट क्यों बन रहे हैं?
  • पुलिस के रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने से लेकर घर तक सुरक्षा पहुंचने के बीच आखिर इतनी बड़ी दूरी क्यों है?
  • सबसे बड़ा सवाल बुजुर्गों की सुरक्षा का भरोसा कागज से निकलकर जमीन पर कब उतरेगा?

“सभी थाना प्रभारियों को निर्देशित किया गया है कि वो अपने थाना क्षेत्र में रहने वाले बुजुर्ग दंपति के घर जाकर जानकारी लेंगे. उनके घर आने वाले नौकर या अन्य लोगों के बारे में जानकारी जुटाएंगे.“- प्रमेंद्र डोबाल, एसएसपी, देहरादून

दून पुलिस ने सीनियर सिटीजन का जाना कुशल क्षेम: देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमेद्र डोबाल ने सभी अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्र में अकेले निवास कर रहे सीनियर सिटीजनों से मुलाकात कर उनकी कुशलक्षेम लेने और उनकी हर संभव सहायता करने के निर्देश दिए हैं. जिसके तहत आज पुलिस टीमों ने नगर और देहात के सभी थाना क्षेत्रों में रह रहे 1 हजार से ज्यादा सीनियर सिटीजन से मुलाकात की.

इस दौरान कुशलता पूछते हुए उनकी समस्याओं के संबंध में जानकारी ली. साथ ही उन्हें हर संभव सहायता का विश्वास दिलाते हुए किसी भी प्रकार की आवश्यकता पड़ने पर सहायता के लिए चीता पुलिस और उच्चाधिकारियों के मोबाइल नंबर उपलब्ध कराए गए. साथ ही सभी बुजुर्गों को साइबर अपराधों के संबंध में भी जानकारी देकर जागरूक किया गया.

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